शायरी हिमांशु
PoetryHimangshu Shekhar Das
दबे हुए जज़्बातों से लेकर आत्मनिर्भर मोहब्बत तक, ये पंक्तियाँ उस सफर को पकड़ती हैं जहाँ चाहत अधूरी रहकर भी शब्दों में हमेशा के लिए जीवित हो जाती है।
“कोई अपने दिल की बातें
बताने को बेक़रार था,
तो कोई सुनने को राज़ी नहीं।
फिर मैंने भावनाओं की समंदर में ही,
अपने जज़्बातों को समाधि दे दी।
मुझे डर कभी तुम्हें खोने का नहीं,
बल्कि ये था कि
कभी मेरे मन में
तुम्हारे लिए मोहब्बत कम न हो जाए।
पर अब मैं काफ़ी आगे बढ़ गया हूँ,
तुमसे प्यार करने के लिए
अब तुम्हारी ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
अब जब मैं अपने जज़्बात
लफ़्ज़ों में नहीं बयाँ कर सकता,
मेरी क़लम ने उन्हें तुम्हारे लिए
अमर कर दिया है।”
— हिमांशु
“चेहरा है या चौदहवीं की चाँद
की मैं खो गया,
दिल है या
चाँदनी चौक की गली
की मैं भटक गया।
दोनों ही दूर से
बेशक बहुत सुंदर,
पर इधर मैं
तुम्हारी दिल की
जुंगल में फस गया।
पर यकीन है
हमारी प्यार की
मंज़िल होगी बहुत
खूबसूरत,
और रास्ता होगी
उससे भी ज्यादा रोमांचक।
गुज़र जाऊँगा तुम्हारी
दिल की गली से,
छू जाऊँगा
तुम्हारी हर फिक्र को।
आख़िर में जीत होगी
मेरी मोहब्बत की,
तुम्हारी और मेरी
इत्तेहाद होगी।”
~ हिमांशु
