सुनसान रात
PoetryMahendra
एक अकेली, सुनसान रात का चित्रण जो डर, सन्नाटे और आत्मिक संवाद के बीच इंसान को खुद से मिलवा देती है। क्या यह रात सिर्फ खामोशी है, या भीतर छुपी किसी सच्चाई की आवाज़?
एक सुनसान रात थी,\
खुशियाँ मुझसे लिपटी हुई कुछ कदम ही मेरे साथ थी,\
घूरते काले बादलों के नीचे,\
चिल्लाती शांति के भीतर,\
दौड़ती पवनो के पीछे,\
मै और मेरी कंपकम्पी, सहमी परछाई थी,\
एक सुनसान रात थी।
वो सबकुछ देख रही थी
सुन रही थी,\
अंदाशा कर रही थी;
कि मानो
इसका सब कुछ बिछड़ सा गया हो
जिंदगी से कुछ मन मुड़ गया हो ,
सन्नाटे भरी गोद में लाकर वो मुझे
अपनी ममता का प्रमाण दे रही थी।
सन्नाटा गूंज रहा था\
और मैं खामुशी में झूम रहा था।\
वो रात कुछ गा रही थी\
हवाएँ भी फुंस-फुंसा रही थी।\
जैसे बालो के नीचे\
कुछ बता रही थी।
मुझे वह झकझोर गई।\
कुछ कह गई;
अपना अहसास करा गई;
कि मैं हूँ।\
एक सुनसान रात\
तुम्हारे साथ।
